गोवर्धन गिरधारी Govardhan Girdhari Lyrics in Hindi – Divya Kumar, Narci

अरे बांसुरी की धुन पर झूमे नाचे जग सारा
अरे बांसुरी की धुन पर झूमे नाचे जग सारा

चलो द्वापर के वृन्दावन में
लीला सुनाता हूं फिर से तुम्हें
लीला अनेक पर अब मैं बताऊंगा
शचिपति को क्यों कान्हा चुभे

पूजा की तयारी में सारे वे व्यास
त्यारी को देख किया कान्हा ने व्यक्त
रहे विलास में डूबा जो समस्त
कैसे वो देव जरा बोलो ये सब
कान्हा को लोग यही बताते हैं
इंद्र की ऐसी ना स्तुति है गाते
मेघों के राजा वो हुए जो रुष्ट
तो वृन्दावन वासी रह जायेंगे प्यासे

कान्हा तो बोले हे स्त्री वा पुरुष
प्रभु कब देते हैं लोगों को कष्ट
प्रभु तो हरते हैं पीड़ा को उल्टा
प्रभु को भक्तों से होते ना रुष्ट
गुस्से में भला वो होंगे क्यों गर्म
वर्षा तो इंद्र का देना है धर्म
हरि आदेशों को करते हैं पालन

स्वयं नहीं वो हरि है पर
गोवर्धन की पूजा करें
जहां पे सैरों की गैया चारे
करे गोवर्धन का मिलके आभार
जैसे चले वृन्दावन का व्यापार
पाहुंचे संवर्तक इन्द्र के द्वार
सुनाया उनको था ये समाचार

इंद्र का उठा था क्रोध कुछ ऐसा
जैसे हां सागर में प्रखर ज्वार
बोला कि कैसे दुस्साहस हुआ
निर्णय ये लोगों का घातक हुआ
किसके हां कहने पे त्यागा मुझे
ऐसा भला कौन शसक हुआ
बोला संवर्तक है बालक कोई

नन्द का बेटा ना नायक कोई
कहते हैं कृष्ण उपयोग सभी
सबको मनायें करण वही
शचीपति का जग था कोप
रहा था गुस्से में यही वो सोच
पूजा ना करी थी मेरी इन्होनें
सारे सहेंगे अब मेरा बचाव

चक्र उठा के जिसने चक्र उठाया के जिसने
बदली समय की धरा धरा धरा धारा
मेरा कृष्ण कन्हैया कारा
हे मेरा कृष्ण कन्हैया कारा
मेरा कृष्ण कन्हैया कारा
हे मेरा कृष्ण कन्हैया कारा

दिया संवर्तक को फिर था आदेश
निकालो तुम्हारे वो प्रलय के मेघ
लोगों के गांव में करो प्रवेश
इंद्र का थमा न जरा भी द्वेष
दिखा दो विपत्ति का ऐसा असर
वर्षा में छोरो ना कोई कसार
पानी का कर डालो ऊंचा हां स्टार
पानी से भर डालो सारो के घर
गलती भी जाएगी तभी सुधार
देखेंगे जब ऐसा ये डर

कांपेंगे लोग तभी अधर
इन्द्र को पूजेगा तभी स्वर को
चला संवर्तक करने को नाश
आँधी को भेजे वो खड़े आकाश
देखा था लोगों का जैसा ही त्रास
बिजली का करता था वो तो प्रकाश
लोगों ने बोला ये क्या किया कान्हा
क्रोध में बैठे हैं मेघों के राजा
क्यों ही थी मानी बात तुम्हारी
रोकोगे कैसे हां नाश भी ताज़ा
सबको हाँ बोले वे कान्हा अटल
हृदय में चिंता को लेना ना भार
चलो गोवर्धन को बोले वे वो
पर्वत ही बनेगा रक्षा का घर
बोले गोवर्धन को झुका के सर
नारी और नर में आये शरण
करो सहयोग बोला उन्हे

पर्वत के नीचे लगा डाला कर
हरि से चलता है सारा संसार
लोगों की सुने वो क्यों ना गुहार
एक ही अंगुली पर रखा प्रभु ने
देखो गोवर्धन का सारा ही भार
लीला ये देख सारे अचम्भित
पर्वत के नीचे वे सारे उपस्थित
समय था हरि की लीला से रणजीत
मेघो का राजा भी हुआ प्रकम्पित
गोवर्धन के नीचे पधारे
गैया की भीड़ सारे ग्वाले
शचिपति न खुद को संभाले
बैठा ऐरावत में खाता उबाले
बैठा ऐरावत में वज्र निकले
वाह तो गोवर्धन पर बिजली उछाले
हरि ने सही न उसकी क्रिया
करि पराजय थी उसके हवाले

वृन्दावन का तू नन्दन
मथुरा का तू मनमोहन
तू प्रीतम है गोपियों का
तन मन धन तुझको अर्पण

हरि को जैसा वो गया पहचान
बोला क्षमा करो कृपा निधान
समझ था मैं जिसे बालक नादान
वो सारे सृष्टि के प्राण
इंद्र को जैसा ही हुआ था ज्ञान
हरि ने दिया था क्षमा का दान
हरि की योग माया में फास
सका नहीं था वो उनको पहचान
क्षमा न होगी पर वो विचार
जहां बाजा अभिमानी सितार

जो था कर्तव्य तुम्हें निभाना
वे मान बैठे अधिकार का उपयोग करें
इंद्र वे बोले ये भूल प्रभु
क्षमा करो हे श्रीनिवास
धर्म निभाना मैं गया था भूल
अंधा हुआ था प्रभु का दास
माँ कामधेनु हुई प्रकट

बोली कि जागी है ज्ञान लापता
क्षमा करो अब दयानिधि
गया था दास थोड़ा भटक
सुनी थी माता की जैसी ही बात
हरि का गुस्सा भी हुआ शांत
किया क्षमा फिर मेघों के राजा को
लगा कि नया सा हुआ प्रभात

तू यशोदा का बाला
तू नन्द का दुलारा

मेरा कृष्ण कन्हैया कारा
हे मेरा कृष्ण कन्हैया कारा
मेरा कृष्ण कन्हैया कारा
हे मेरा कृष्ण कन्हैया कारा

क्या सृष्टि का बस तू ही है
बस तू ही एक सहारा

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