जाने कितने दिन बाद हुई
गुनगुनाते चले मौसम
जाने कितने दिन बाद हुई
मैंने अर्ज़ करी बारिश
तेरे आने पे इरशाद हुई
मैंने अर्ज़ करी बारिश
तेरे आने पे इरशाद हुई
कुछ मरते हैं कुछ पागल उसपे
लोग हवाएँ और बादल उसपे
कुछ मरते हैं कुछ इतने पागल उसपे
अरे लोग हवाएँ बरखा और बादल उसपे
ये क्या हुआ कैसे हुआ
कुछ याद फिर ना यार मुझे
ऐसा कभी देखा नहीं
लाहोश में अब यार मुझे
जब हाथ लगे तेरे फूल पर
तो फूलों से जल गईं तितलियाँ
तूने हँस के जो देखा चाँद को
फिर ज़ोरों से कड़की बिजलियाँ
खुल के घटा बरसी
तुझे देख दिन-रात हुई
मैंने अर्ज़ करी बारिश
तेरे आने पे इरशाद हुई
मैंने अर्ज़ करी बारिश
कुछ मरते हैं कुछ पागल उसपे
लोग हवाएँ और बादल उसपे
कुछ मरते हैं कुछ इतने पागल उसपे
अरे लोग हवाएँ बरखा और बादल उसपे
कहीं इस जहाँ से, कहीं उस जहाँ से
तेरा कोई ना कोई ताल्लुक़ लगता आसमां से
वैसे समय तो शायर है लेकिन
तेरे लिए लाए नए-नए लफ़्ज़ कहाँ से
क्या बात लिखूं तुझ पर बता
ख़यालों से अपनों को उतार कर
तेरे एक इशारे पर सुना
मैंने गिरती हैं बूँदें हार कर
लौट गया घर तू
फिर पल ना बरसात हुई..